केन-बेतवा लिंक परियोजना, मझगाय, रुंझ और सिंगरौली-ललितपुर रेल लाइन सहित विभिन्न परियोजनाओं से प्रभावित विस्थापितों के न्याय, हक और उचित मुआवजे की मांग को लेकर चल रहा चिता आंदोलन 12वें दिन भी जारी रहा. आंदोलनकारियों ने चिता सत्याग्रह, मिट्टी सत्याग्रह, फांसी सत्याग्रह और जल सत्याग्रह के बाद अब सूली सत्याग्रह भी शुरू कर दिया है. आंदोलनकारियों का कहना है कि लगातार विरोध के बावजूद प्रशासन उनकी समस्याओं का अपेक्षित समाधान नहीं कर रहा है. आंदोलन के शुरुआती दिनों में प्रदर्शन स्थल पर ‘आदिवासियों का शोषण नहीं सहेंगे’, ‘किसानों का शोषण नहीं सहेंगे’ और ‘पन्ना प्रशासन होश में आओ’ जैसे नारे लगाए जा रहे थे. बिना मुआवजा दिए गांव डुबोना बंद करो’ जैसे नारे भी सुनाई देने लगे हैं. प्रभावितों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है.
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर ने कहा कि जिस परियोजना की प्रक्रिया को 15 वर्ष से अधिक समय हो चुका है, उसके बावजूद यदि गांव डूबने की स्थिति में आने पर भी प्रभावित परिवारों के मुआवजे और पुनर्वास के मामले लंबित हैं. भटनागर ने कहा, ‘राज्य का अपने ही बनाए कानून का पालन न करना चिंता का विषय है. जब कानून प्रभावितों के अधिकार और पुनर्वास की व्यवस्था करता है, तो डूब आने से पहले उसका पालन सुनिश्चित करना शासन की जिम्मेदारी है.’ आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रभावितों की सूची, मुआवजा, पुनर्वास और संपत्तियों के मूल्यांकन से जुड़े कई मामले अभी भी लंबित हैं. वहीं प्रशासन की ओर से प्रभावितों के मामलों के निराकरण और गांव-गांव जाकर कार्रवाई किए जाने की बात कही जा रही है. आंदोलनकारी इन दावों के बीच जमीन पर प्रभावित परिवारों की स्थिति को लेकर सवाल उठा रहे हैं.
आंदोलन को दबाने का आरोप
भटनागर ने कहा कि ‘गांव डूब रहे हैं, घर डूब रहे हैं और जिंदगियां डूब रही हैं, लेकिन जिम्मेदारों की बेशर्मी तैर रही है.’ उनके अनुसार आंदोलन को दबाने के लिए नोटिस और अन्य प्रशासनिक कार्रवाई का इस्तेमाल किए जाने का आरोप भी प्रभावितों में असंतोष बढ़ा रहा है. उन्होंने इसे ‘आंदोलन का नहीं, लोकतंत्र का दमन’ बताया. पिछले 12 दिनों से प्रभावित ग्रामीण अलग-अलग तरीकों से अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं. आंदोलनकारियों के अनुसार चिता से लेकर सूली तक के प्रतीकात्मक सत्याग्रह इस बात को सामने लाने का प्रयास हैं कि मुआवजा और पुनर्वास के बिना विस्थापन की प्रक्रिया आगे बढ़ने से परिवारों के सामने गंभीर संकट पैदा हो रहा है.








