पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से अल्पसंख्यक सिख समुदाय की आस्था को झकझोर देने वाली एक बेहद शर्मनाक घटना सामने आई है. पंजाब के फारूकाबाद (मंडी चूहड़काणा) में स्थित करीब 125 साल पुराने ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री सिंह सभा को स्थानीय भूमाफिया ने प्रशासन के साथ साठगांठ करके जमींदोज कर दिया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस कायराना हरकत को 24 जून की रात अंजाम दिया गया, जिसके बाद से ही पूरी दुनिया में रहने वाले सिख संगठनों में भारी गुस्सा है.
यह ऐतिहासिक गुरुद्वारा सिख इतिहास की साझी संस्कृति का एक अनूठा प्रतीक था. घटना की भनक लगते ही स्थानीय सिख समुदाय के लोग बड़ी संख्या में मौके पर इकट्ठा हो गए और कड़ा विरोध जताते हुए तोड़फोड़ के काम को रुकवाया. सिखों के बढ़ते आक्रोश और दबाव के आगे घुटने टेकते हुए आखिरकार स्थानीय प्रशासन ने फिलहाल इस ऐतिहासिक जगह को सील कर दिया है और यहां किसी भी तरह के निर्माण या आगे की तोड़फोड़ पर रोक लगा दी है.
समझिए गुरुद्वारा सिंह सभा का शानदार इतिहास और इसका महत्व
यह गुरुद्वारा साहिब सिख इतिहास में बेहद खास मुकाम रखता है:
जत्थेदार करतार सिंह झब्बर का कनेक्शन: 1912 में जत्थेदार करतार सिंह झब्बर ने चूहड़काणा में ‘खालसा दीवान खरा सौदा बार’ का गठन किया था.
इतिहास: 1918 में इसी संगठन के अधीन गुरुद्वारा सच्चा सौदा के पास भाई मूल सिंह गुरमुला द्वारा खरीदी गई जमीन पर एक मिडिल स्कूल शुरू किया गया था.
प्राचीन निशानियां: वर्तमान समय में भी गुरुद्वारा साहिब के मुख्य भाग पर ‘गुरमुखी लिपि में सतगुरु नानक प्रगट्या, मिटी धुंध जग चानण होआ’ और संवत 1919 (सन् 1862) उकेरा हुआ साफ दिखाई देता है.
4 साल से रची जा रही थी साजिश
स्थानीय सिख एक्टिविस्ट्स और जानकारों का कहना है कि इस ऐतिहासिक धरोहर को मिटाने की साजिश पिछले 4 साल से चल रही थी. 4 साल पहले तक इस गुरुद्वारा साहिब की प्राचीन निशानियां पूरी तरह सुरक्षित थीं, जिसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था.
इसके कुछ समय बाद भूमाफिया ने गुरुद्वारा साहिब के मुख्य गुंबद को तोड़कर इस पर कब्जा करने की कोशिश की. सिखों का आरोप है कि उस वक्त भी पुलिस और प्रशासन से लिखित शिकायत की गई थी, लेकिन पाकिस्तान के ‘इवैक्युएशन ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड’ (ETPB) और ‘पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी’ ने इस अनमोल धरोहर को बचाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए, जिसका नतीजा आज सबके सामने है.
भारत से आए शरणार्थियों को रहने के लिए मिला था ठिकाना
साल 1947 में हुए विभाजन के बाद से ही ये ऐतिहासिक गुरुद्वारा वीरान पड़ा हुआ था. इसके बाद साल 1960 में पाकिस्तान सरकार ने इस खाली पड़ी गुरुद्वारा प्रॉपर्टी को भारत से आए शरणार्थियों को रहने के उद्देश्य से अलॉट (आवंटित) कर दिया था.
इन ऐतिहासिक इमारतों की देखरेख करने वाले शब्बीर हुसैन ने बताया कि शरणार्थियों को इसे केवल रहने के लिए दिया गया था. नियम के मुताबिक, इस प्राचीन और ऐतिहासिक ढांचे के मूल स्वरूप में कोई भी बदलाव, नया कंस्ट्रक्शन या इसे गिराने की सख्त मनाही थी. लेकिन भूमाफिया ने सारे सरकारी नियमों को रद्दी की टोकरी में डालते हुए इस 125 साल पुरानी साझी विरासत को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया.
जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई की मांग
इस घटना के बाद पाकिस्तान के सिख प्रतिनिधियों ने शाहबाज शरीफ सरकार पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में नाकाम रहने और भूमाफिया को सह देने का सीधा आरोप लगाया है. सोशल मीडिया पर भी इस कायराना हरकत के खिलाफ वैश्विक स्तर पर अभियान छिड़ गया है. दुनिया भर के सिख संगठनों का कहना है कि गुरुद्वारा साहिब जैसी ऐतिहासिक इमारतें किसी एक धर्म या देश की बपौती नहीं होतीं, बल्कि ये पूरी इंसानियत की साझी अमानत हैं.
सिखों ने मांग की है कि इस साजिश में शामिल भूमाफिया और भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारियों को तुरंत गिरफ्तार कर उनके खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए. फिलहाल वक्फ बोर्ड ने इस मामले में कानूनी कार्रवाई की तैयारी शुरू करने की बात कही है, लेकिन सिख संगत में अविश्वास का माहौल बरकरार है.








