रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) बैंकों और एनबीएफसी (NBFC) के लोन रिकवरी से जुड़े नियमों को सख्त बनाने जा रहा है. इसके लिये आरबीआई (RBI) की तरफ से प्रपोजल दिया गया है कि बैंक अब कर्ज वसूली के लिए जमीन या मकान जैसी अचल संपत्ति को अपने कब्जे में ले सकेगा. साथ ही डिफॉल्टरों से कब्जे में ली गई प्रॉपर्टी को बैंक अपने पास अधिकतम सात साल तक ही रख सकेंगे. रिजर्व बैंक की तरफ से उठाए गए इस कदम का मकसद बैंकों के अकाउंट को साफ रखना और वसूली से जुड़े प्रोसेस में ट्रांसपेरेंसी लाना है. आरबीआई की तरफ से इस प्रपोजल पर 26 मई तक सुझाव मांगे गए हैं.
रिजर्व बैंक (RBI) की तरफ से जारी ड्राफ्ट के अनुसार बैंक इन संपत्तियों को तब ही अपने नाम कर सकेंगे, जब वसूली के बाकी रास्ते पूरी तरह बंद हो चुके हो. आरबीआई (RBI) की तरफ से यह भी साफ किया गया कि इन प्रॉपर्टी को ‘स्पेसिफाइड नॉन-फाइनेंशियल एसेट्स’ (SNFA) के रूप में तब ही कैटेगराइज किया जा सकता है जब बैंक यह तय कर ले कि अब कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है. अक्सर यह देखा जाता है कि लोन नहीं चुका पाने की हालत में बैंक गिरवी रखी गई अचल संपत्ति पर कब्जा कर लेते हैं.
संपत्तियों को बेचने के लिए सात साल की लिमिट तय
केंद्रीय बैंक का मानना है कि इन संपत्तियों के निपटान का एक समय तय होने से बैंकों को अपनी बकाया रकम अधिकतम सीमा तक वापस मिल सकेगी. यह नियम उन प्रॉपर्टी पर लागू होगा, जिनको एनपीए (NPA) घोषित किया जा चुका है और जहां कानूनी उपाय फेल रहे हैं. नए फ्रेमवर्क के तहत संपत्तियों को बेचने के लिए सात साल की लिमिट तय की गई है. जानकारों का मानना है कि यह टाइम लिमिट व्यावहारिक है, क्योंकि रियल एस्टेट मार्केट में संपत्तियों की बिक्री करने में समय लगता है.
कम दाम पर प्रॉपर्टी बेचने की मजबूरी खत्म होगी
सात साल का समय बैंकों को ‘फायर सेल’ यानी जल्दबाजी में कम दाम पर प्रॉपर्टी बेचने की मजबूरी से बचाएगा. साथ ही, बैंक इस तरह की प्रॉपर्टी को को अपने नाम कर सकेंगे. एक बार घर या जमीन के नाम होने के बाद इसे एनपीए कैटेगरी से हटाकर बैलेंस शीट में संबंधित अकाउंटिंग हेड के तहत दिखाया जाएगा. आरबीआई ने इस प्रोसेस में किसी भी तरह की गड़बड़ी को रोकने के लिए सख्त नियम जोड़ा है. बैंकों को यह संपत्ति वापस उसी कर्जदार या उससे जुड़ी किसी भी पार्टी को बेचने से पूरी तरह बैन कर दिया गया है.
ट्रांसपेरेंसी बनाए रखने के लिए जरूरी कदम
इस नियम को दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) के सेक्शन 29A की तर्ज पर बनाया गया है. इससे डिफॉल्ट करने वाले प्रमोटर पिछले दरवाजे से अपनी ही संपत्ति को फिर से हासिल नहीं कर सकें. हालांकि, कुछ जानकारों का मानना है कि पूरी तरह बैन लगाने से प्रॉपर्टी की सही कीमत मिलने में दिक्कत आ सकती है, लेकिन ट्रांसपेरेंसी बनाए रखने के लिए यह जरूरी कदम है. यदि बैंक सात साल की तय टाइम लिमिट के अंदर संपत्ति को नहीं बेच पाता तो उसे एक अलग प्रोसेस को फॉलो करना होगा. इस हालात में यदि प्रॉपर्टी का दाम जीरो हो जाता है तो उस प्रापर्टी को बैंक के अपने यूज के लिए मान लिया जाएगा.
इसके बाद इसे ‘स्पेसिफाइड नॉन-फाइनेंशियल एसेट्स’ (SNFA) कैटेगरी से हटाकर बैंक के फिक्स्ड एसेट्स कैटेगरी में डाल दिया जाएगा. आरबीआई ने यह भी साफ किया कि किसी भी प्रॉपर्टी को तब ही ‘अधिग्रहित’ माना जाएगा, जब उसका टाइटल ऑफिशियल तौर पर बैंक या एनबीएफसी के नाम ट्रांसफर हो जाए.
आरबीआई की तरफ से क्या प्रपोजल दिये गए?
- आरबीआई ने बैंकों और एनबीएफसी के लिए लोन वसूली से जुड़े नियमों का ड्राफ्ट पेश किया.
- एनपीए की वसूली के लिए बैंक गिरवी रखी गई जमीन या मकान पर अपना कब्जा ले सकेंगे.
- बैंक इस तरह की प्रॉपर्टी को हमेशा नहीं रख पाएंगे. संबंधित जमीन को सात साल के अंदर बेचना होगा.
- ऐसी संपत्ति को सही समय पर बेचने से बैंक या एनबीएफसी ज्यादा से ज्यादा वसूली कर पाएंगे.








