मशहूर शायर बशीर बद्र जिन्होंने अपनी मखमली आवाज और बेमिसाल शायरी से साहित्य और उर्दू गजल की दुनिया को समृद्ध किया, अब हमारे बीच नहीं रहे. उन्होंने मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 91 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली. वे लंबे समय से बीमारियों से जूझ रहे थे. उनके निधन की खबर से देश-विदेश के साहित्यिक हलकों के साथ-साथ उनके लाखों चाहने वालों में भी शोक की लहर दौड़ गई है.
दुनिया भर में थे मशहूर
बशीर बद्र अपनी सरल, भावपूर्ण और दिल को छू लेने वाली शायरी के लिए दुनिया भर में मशहूर थे. उन्होंने प्रेम, एकांत, तन्हाई और जीवन के दर्द जैसे विषयों को शब्दों में बेहद खूबसूरती से पिरोया. साहित्य और कला जगत की हस्तियां उन्हें उर्दू शायरी की सबसे प्रिय आवाजों में से एक मानती थीं. उनके निधन को साहित्य जगत के लिए एक गहरी क्षति माना जा रहा है.
यूपी के अयोध्या में हुआ था जन्म
बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को अयोध्या, उत्तर प्रदेश में हुआ था. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा और PhD अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से पूरी की. इसके अलावा उन्होंने वहां उर्दू के प्रोफेसर के रूप में भी सेवाएं दीं. उनकी गजलें अपनी सरल, रूमानी और अत्यंत भावपूर्ण भाषा के लिए प्रसिद्ध हैं.
बशीर बद्र के मशहूर शेर-
1. उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
2. न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की
3. कुछ तो मजबूरियां रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता
4. ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है
5. कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
6. हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में
7. मुख़ालिफ़त से मिरी शख़्सियत संवरती है
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतिराम करता हूँ.








