नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (दमदम एयरपोर्ट) की सुरक्षा और विस्तार को लेकर आज एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया जा सकता है. एयरपोर्ट के रनवे से लगभग सटी हुई 136 साल पुरानी ऐतिहासिक ‘गौरीपुर जामे मस्जिद’ (जिसे स्थानीय लोग ‘बांकड़ा मस्जिद’ भी कहते हैं) को सर्वसम्मति के आधार पर दूसरी जगह स्थानांतरित करने की प्रक्रिया आज ही शुरू होने की संभावना है.
इस संवेदनशील मुद्दे पर उत्तर 24 परगना के जिलाधिकारी कार्यालय में स्थानीय विधायक, प्रशासनिक अधिकारियों और मस्जिद कमेटी के सदस्यों के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक हुई है. इसके तुरंत बाद एयरपोर्ट अथॉरिटी के प्रतिनिधियों और एक विशेष निरीक्षक दल ने मस्जिद का जायजा लिया, जबकि एयरपोर्ट सुरक्षा समिति ने भी इस पर अलग से आपात बैठक की है.
क्यों जरूरी था यह फैसला?
विमानन विशेषज्ञों के मुताबिक, यह मस्जिद रनवे के इतने करीब है कि भारी बारिश या घने कोहरे के दौरान टेक-ऑफ और लैंडिंग करते समय पायलटों के लिए ‘विजुअल इल्यूजन’ पैदा करती थी, जिससे किसी बड़े हादसे की आशंका हमेशा बनी रहती थी. इसके अलावा, इस धार्मिक स्थल की वजह से कोलकाता एयरपोर्ट के दूसरे रनवे के विस्तार का काम पिछले 30 वर्षों से अधर में लटका हुआ था. पूर्ववर्ती वामपंथ और तृणमूल सरकार के दौर में राजनीतिक और धार्मिक भावनाओं के चलते यह मामला लगातार टलता रहा, लेकिन अब सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है.
जानिए इस अनोखी मस्जिद का इतिहास
यह जमीन मूल रूप से एक प्राचीन वक्फ संपत्ति है. 1924 में जब कोलकाता एयरपोर्ट शुरू हुआ, तब जेस्सोर रोड इसी मस्जिद के बगल से गुजरती थी.
1962 का अधिग्रहण: एयरपोर्ट के विस्तार के लिए एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) ने इस जमीन का अधिग्रहण किया.
रास्ता बदला गया: 1965 में मुख्य जेस्सोर रोड को मस्जिद के पास से हटाकर करीब ढाई किलोमीटर घुमा दिया गया.
इसके बाद जेस्सोर रोड से मस्जिद की दूरी करीब 3 किलोमीटर हो गई और यह ऐतिहासिक मस्जिद पूरी तरह से एयरपोर्ट की चारदीवारी और हाई-सिक्योरिटी रनवे क्षेत्र के अंदर घिर कर रह गई.
कड़ी सुरक्षा के बीच होती है नमाज
चूंकि मस्जिद पूरी तरह एयरपोर्ट के सुरक्षित कड़े पहरे वाले इलाके में है, इसलिए यहां नमाज पढ़ने का तरीका भी बेहद अनोखा और सख्त है:
जेस्सोर रोड पर गौरीपुर काली मंदिर के सामने एक छोटा लोहे का गेट बना है, जिसके ठीक ऊपर CISF का वॉच टावर है. नमाज पढ़ने आने वाले लोग वहां लगी कॉलिंग बेल बजाते हैं. इसके बाद सुरक्षाकर्मी उनके पहचान पत्र की गहन जांच करते हैं. सुरक्षा जांच पास होने के बाद, एयरपोर्ट अथॉरिटी नमाजियों को अपनी विशेष टरमैक बसों (जो यात्रियों को विमान तक ले जाती हैं) में बैठाकर कड़ी सुरक्षा के बीच मस्जिद तक ले जाती है. रोजाना तीन शिफ्टों में ऐसी 4-4 बसों का संचालन किया जाता है.
मस्जिद को स्थानांतरित करने की खबरों के बीच आज सुबह से ही इलाके में हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं. सुबह 5 बजे की नमाज के लिए आए लोगों को अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई, जिसके बाद सुबह 9 बजे से ही लोग दोबारा प्रवेश के लिए जुटने लगे. मस्जिद के मुख्य गेट पर पुलिस की कई गाड़ियां और भारी सुरक्षा बल तैनात कर दिया गया है.
रणनीतिक रूप से यह ऑपरेशन पूरी तरह गोपनीय और सुरक्षित रखा गया है. जेस्सोर रोड से मस्जिद की दूरी 3 किलोमीटर होने के कारण बाहर से किसी भी तरह की मीडिया कवरेज नामुमकिन है. अगर मस्जिद को हटाने या शिफ्ट करने का काम शुरू भी होता है, तो एयरपोर्ट के अपने आधुनिक क्रेन और उपकरण पुराने टर्मिनल के कार्गो विभाग से सीधे रनवे के रास्ते अंदर ही अंदर मस्जिद तक पहुंच जाएंगे, जिससे आम जनता या बाहरी प्रदर्शनकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगेगी.








