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तलाक के प्रोसेस में पत्नी पर नहीं लगा सकते ये आरोप, वरना हो सकती है जेल

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हाल ही में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के छोटे भाई प्रतीक यादव ने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक पोस्ट करते हुए सबको हैरान कर दिया है. उन्होंने पोस्ट में अपनी पत्नी अपर्णा यादव से तलाक लेने की बात कही है. उस पोस्ट में अपर्णा यादव की तस्वीर भी लगाई है जिस पर ‘फैमिली डिस्ट्रॉयर’ लिखा है. इसी बीच आइए जानते हैं कि तलाक के मामले में पत्नी पर लगाए गए कौन से आरोप असल में जेल की वजह बन सकते हैं.

चरित्र पर झूठे आरोप 

ठोस सबूत के बिना पत्नी पर अनैतिक आचरण या फिर ढीले चरित्र का आरोप लगाना तलाक की कार्यवाही के दौरान सबसे खतरनाक गलतियों में से एक है. अगर ऐसे दावे सार्वजनिक रूप से किए जाते हैं जैसे कि सोशल मीडिया, इंटरव्यू या फिर कानूनी दलीलों में भी, तो पत्नी को आपराधिक मानहानि का मामला दर्ज करने का पूरा अधिकार है. भारतीय न्याय संहिता के तहत मानहानि एक दंडनीय अपराध है. इस जुर्म में जेल के साथ-साथ जुर्माना भी हो सकता है.

सबूत के बिना पत्नी को मानसिक रूप से अस्थिर कहना

बिना प्रमाणित मेडिकल सपोर्ट की अगर पत्नी को मानसिक रूप से बीमार या फिर पागल कहा जाता है तो अदालत में इसे काफी गंभीरता से लिया जाएगा. ऐसे बयानों को मानसिक क्रूरता माना जाता है, खासकर जब तलक के दावे को मजबूत करने के लिए इनका इस्तेमाल किया जा रहा हो. ध्यान देने वाली बात यह है कि पति के मामले में मदद करने के बजाय यह आरोप अक्सर इसे कमजोर कर देता है. ऐसा इसलिए क्योंकि अदालत पति को ही क्रूरता करने वाला मान सकती है.

झूठ आपराधिक आरोप लगाना 

अगर कोई पति तलाक में फायदा उठाने के लिए अपनी पत्नी पर झूठे आरोप लगता है जैसे की धोखाधड़ी, चोरी या फिर दुर्व्यवहार तो उसे खुद अभियोजन का सामना करना पड़ सकता है. कानून के तहत झूठी आपराधिक कार्रवाई शुरू करना एक गंभीर अपराध है. दोषी पाए जाने पर जेल हो सकती है.

सोशल मीडिया या फिर पब्लिक में बेइज्जती 

सोशल मीडिया पर पत्नी के बारे में अपमानजनक बातें कहना, उसका नाम पब्लिक में लेना या फिर प्राइवेट झगड़ों को ऑनलाइन शेयर करने से कई कानूनी नतीजे हो सकते हैं. मानहानि के अलावा ऐसे काम एक महिला के सम्मान और प्राइवेसी के अधिकार का उल्लंघन कर सकते हैं. भले ही बयान पर्सनल राय हो, अदालत इस बात को देखती है कि क्या वे इज्जत को नुकसान पहुंचाते हैं या अपमान करने के इरादे से दिए गए हैं.

सबूत के बिना आरोप तलाक के केस को उल्टा कर सकते हैं 

भारतीय फैमिली कोर्ट सबूत पर काम करती हैं भावनाओं पर नहीं. अगर आरोप बिना डॉक्यूमेंट, गवाहों या फिर मेडिकल रिकॉर्ड के लगाए जाते हैं तो कोर्ट उन्हें बिना किसी आधार के और बदले की भावना से किया गया मान सकती है. कई मामलों में पत्नियों ने क्रूरता और मानहानि के लिए काउंटर केस दायर किए हैं जिस वजह से कानूनी संतुलन पूरी तरह से बदल गया.

 

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