सिक्किम से सटे चीन बॉर्डर पर डोकलाम विवाद के बाद तत्कालीन थलसेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने सेना की रणनीति में बदलाव की कोशिश की थी. 2017 में चीन की पीएलए ने सिक्किम से सटे डोकलाम में घुसपैठ की कोशिश की थी, लेकिन भारतीय सेना ने 72 दिनों तक चीनी सेना को डोकलाम में बांध कर रखा था. इसी विवाद के बाद 2019 में भारतीय सेना ने आईबीजी बनाने की तैयारी शुरू की.
आईबीजी- सेना के एक ब्रिगेड से थोड़ी बड़ी फॉर्मेशन है, जिसमें इंफैन्ट्री के साथ-साथ टैंक, आर्टिलरी, आर्मी एविएशन (अटैक हेलीकॉप्टर) भी शामिल होते हैं और एयर-डिफेंस भी शामिल हैं. जैसे कि किसी डिवीजन में होती हैं. जनरल रावत आईबीजी इसलिए बनाना चाहते थे, क्योंकि शांति-काल में स्ट्राइक कोर सीमा से दूर तैनात रहती हैं. युद्ध के हालात में उन्हें बॉर्डर पर भेजने में लंबा समय लगता है. बता दें कि स्ट्राइक कोर, वो कोर होती हैं जो जंग में दुश्मन की सीमा में घुसकर हमला करती हैं, जबकि दूसरी कोर का डिफेंसिव रोल होता है. वे सीमा पर हालात सामान्य बनाने का काम करती हैं.
बता दें कि आईबीजी अपने छोटे स्वरूप के चलते तेजी से बॉर्डर पर दुश्मन के खिलाफ लोहा लेने के लिए तैयार रहती है. जनरल रावत ने 2019 में पहली बार चीन के खिलाफ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर आईबीजी ग्रुप को तैनात करने का मसौदा तैयार किया था लेकिन इसे 7 साल बाद अमली-जामा पहनाया जा सका है. इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप (IBG) को सेना ने सबसे नई स्ट्राइक कोर (माउंटेन स्ट्राइक कोर) जिसे ब्रह्मास्त्र के नाम से जाना जाता है, उसके अंतर्गत खड़ा किया है.
कहां है आईबीजी का हेडक्वार्टर
आईबीजी का हेडक्वार्टर बंगाल के पानागढ़ में है और इसका एरिया ऑफ RESPONSIBILITY-AOR उत्तर-पूर्व से सटी पूरी चीन सीमा है. सेना ने शुरूआत में 5 आईबीजी को इस माउंटेन स्ट्राइक कोर के तहत तैयार किया है, क्योंकि सेना की ऑपरेशनल तैनाती क्लासीफाइड होती है, ऐसे में हम आपको आईबीजी की EXACT लोकेशन नहीं बता सकते हैं, लेकिन इतना बता सकते हैं कि ये सभी माउंटेन स्ट्राइक कोर ऑपरेशनल एरिया में तैनात की गई है.
आईबीजी बनाने में 7 साल क्यों लगे
दरअसल सेना के मूलभूत ढांचे में बदलाव के लिए सरकार से परमिशन की जरूरत होती है क्योंकि इसके लिए नए अधिकारियों से लेकर फंड की भी जरूरत पड़ती है. ऐसे में ब्यूरोक्रेसी की तरफ से आईबीजी को बनाने में थोड़ा अड़ंगा जरूर लगाया गया था, लेकिन जब तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने सार्वजनिक तौर से अपनी नाराजगी जाहिर की, तब जाकर सरकार ने री-स्ट्रक्चरिंग के लिए इजाजत दी. इस तरह सेना ने जनरल रावत की मौत के बाद भी आईबीजी का प्लान जिंदा रखा और अब उसे चीन सीमा पर ट्रायल के तौर पर तैनात कर दिया है. माना जा रहा है कि चीन सीमा पर ट्रायल सफल रहने के बाद पाकिस्तान सीमा पर भी ऐसी आईबीजी तैनात की जाएंगी.
जनरल रावत का सपना हुआ पूरा
यहां पर ये भी बताना जरूरी है कि पूर्व सीडीएस जनरल रावत जब सेना प्रमुख थे यानी 2016 से 2019 तक, उस दौरान कई दशक बाद भारतीय सेना ने सीमा पर चीन की सेना की ‘सलामी-स्लाइसिंग’ पर रोक लगाई थी. 2020 में जब जनरल रावत सीडीएस के पद पर थे, तब गलवान घाटी की झड़प के दौरान भी भारतीय सेना ने चीनी सेना को घेर लिया था. उसके बाद से चीनी सेना ने 3488 किलोमीटर लंबी एलएसी, लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर घुसपैठ की कोशिश नहीं की.
बता दें कि गलवान घाटी की झड़प में भी भारत को अपनी पूरी एक स्ट्राइक कोर को एलएसी पर तैनात करना पड़ा था. दिसंबर 2021 में जनरल रावत हेलीकॉप्टर क्रैश में शहीद हो गए. उस वक्त वो चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के पद पर थे लेकिन जनरल रावत की मौत के बाद भी सेना ने आईबीजी प्लान को जिंदा रखा और हाल में रिटायर हुए थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने आईबीजी का सपना साकार किया.








