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सुबह वाली चाय हो जाएगी महंगी, अल-नीनो बढ़ाएगा टेंशन, थाली से गायब हो सकती हैं दाल-सब्जियां; पनीर-घी के दामों में भी लगेगी आग

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तपती गर्मी के बाद देश को मॉनसून का इंतजार रहता है, लेकिन इस बार प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) से उठ रही एक मौसमी हलचल आपकी जेब पर भारी पड़ने वाली है. इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि वैश्विक स्तर पर सक्रिय हो रहा ‘सुपर एल नीनो’ (Super El Nino) भारत के मॉनसून चक्र को बिगाड़ सकता है. इसका सीधा और सबसे पहला असर आपकी सुबह की चाय और थाली पर पड़ेगा, क्योंकि कमजोर बारिश के चलते दूध से लेकर रोजमर्रा के राशन के दाम एक बार फिर आसमान छू सकते हैं.

डेयरी कंपनियां अभी से ही कीमतों में आने वाले इस उछाल से निपटने की रणनीति बनाने में जुट गई हैं. ‘पराग मिल्क फूड्स’ के चेयरमैन देवेंद्र शाह के मुताबिक, मई में दूध की कीमतें पहले ही लगभग 2 से 3 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं. अगर देश के मुख्य दूध उत्पादक राज्यों में बारिश सामान्य से कम रहती है, तो जुलाई-अगस्त तक कीमतों में 3 से 4 प्रतिशत की और बढ़ोतरी होना तय है.

समझिए समंदर की हलचल और दूध की कीमतों का कनेक्शन

यह सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है कि हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर का मौसम भारत में दूध के दाम कैसे तय करेगा, लेकिन इसके पीछे एक बेहद आसान आर्थिक चेन  काम करती है:

सुपर एल नीनो:

– कमजोर मॉनसून

– सूखा व पानी की कमी

– हरे चारे की भारी किल्लत

– मवेशियों के रखरखाव की बढ़ती लागत 

– दूध उत्पादन में गिरावट

– दूध और डेयरी प्रोडक्ट्स के दाम में उछाल

गाय-भैंस जैसे डेयरी पशु पूरी तरह से हरे चारे और भरपूर पानी पर निर्भर करते हैं. जब बारिश कम होती है, तो चारे की भारी किल्लत हो जाती है और उसकी लागत बढ़ जाती है. ऐसे में किसानों के लिए पशुओं को पालना महंगा हो जाता है, जिससे मार्केट में दूध की सप्लाई घट जाती है. अमूल, मदर डेयरी और पराग जैसी बड़ी कंपनियों ने हाल ही में जो दाम बढ़ाए थे, वह सिर्फ शुरुआत हो सकती है. अगर हालात नहीं सुधरे, तो दूध के साथ-साथ दही, पनीर, छाछ, मक्खन और घी के लिए भी आपको अपनी जेब और ढीली करनी होगी.

दाल से लेकर रसोई तेल तक; इन चीजों पर मंडरा रहा है सबसे बड़ा खतरा

कमजोर मॉनसून सिर्फ दूध तक सीमित नहीं रहेगा. PwC इंडिया’ ने चेतावनी देते हुए कहा कि प्रशांत महासागर में एक ‘सुपर एल नीनो’ आकार ले रहा है, जिससे भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खेती सीधे तौर पर रिस्क में है. इसका असर सिर्फ खरीफ (गर्मी) के सीजन तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सूखी और गर्म सर्दियां आगे चलकर रबी की फसलों को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं.

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इन 4 मोर्चों पर सबसे ज्यादा महंगाई देखने को मिल सकती है:

दालें: अरहर (तूर) और अन्य उड़द-मूंग जैसी दालें पूरी तरह बारिश पर निर्भर होती हैं. कम बारिश से इनकी पैदावार में भारी कमी आ सकती है.
खाने का तेल : सोयाबीन और अन्य तिलहनों का उत्पादन घटने से भारत की विदेशी इम्पोर्ट (आयात) पर निर्भरता बढ़ेगी, जिससे कुकिंग ऑयल के दाम बढ़ेंगे.
हरी सब्जियां: हरी सब्जियों की सप्लाई चेन में जरा सी भी रुकावट आते ही खुदरा बाजार में कीमतें रॉकेट की तरह भागती हैं.
पशुधन उत्पाद: चारे और अनाज की बढ़ती कीमतों का सीधा असर पोल्ट्री फीड पर पड़ेगा, जिससे समय के साथ अंडे और चिकन भी महंगे हो सकते हैं.

‘डेलॉयट साउथ एशिया’ में क्लाइमेट चेंज के लीडर भी यही मानते है कि बारिश पर निर्भर फसलों के कमजोर होने से ग्रामीण आय घटेगी, जिससे देश की ओवरऑल इकोनॉमिक सेंटिमेंट पर दबाव बनेगा.

चावल और गेहूं के मोर्चे पर फिलहाल सुकून क्यों?

क्या इस सूखे का असर देश के मुख्य अनाज यानी चावल और गेहूं पर भी पड़ेगा? एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ऐसा जरूरी नहीं.

भारत इस बार पिछले एल नीनो एपिसोड के मुकाबले कहीं बेहतर स्थिति में है. इसकी मुख्य वजहें ये हैं:

1. भारत सरकार के पास अनाज (गेहूं-चावल) का बंपर बफर स्टॉक मौजूद है.
2. देश के मुख्य जलाशयों और बांधों में पानी का लेवल फिलहाल बेहतर है.
3. दालों की तुलना में चावल-गेहूं के बेल्ट में सिंचाई  की आधुनिक सुविधाएं ज्यादा मजबूत हैं.

क्या आम जनता को अभी से परेशान होना चाहिए?

आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि एल नीनो का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि देश में अकाल या भयानक महंगाई आ ही जाएगी. बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि बची हुई बारिश का डिस्ट्रीब्यूशन (वितरण) कैसा रहता है और सरकार बफर स्टॉक व इम्पोर्ट ड्यूटी को कैसे मैनेज करती है.

फिलहाल एक्सपर्ट्स आम उपभोक्ताओं को जुलाई और अगस्त के महीनों पर नजर रखने की सलाह दे रहे हैं, जो भारतीय कृषि के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं. अगर इन दो महीनों में मॉनसून ने रफ्तार पकड़ ली, तो महंगाई का यह खतरा टल सकता है. अन्यथा, साल के बचे हुए छह महीनों में आपको एक भारी-भरकम किराने के बिल का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा.

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Author: admin

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