नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि भारत का व्यापार बढ़ जरूर रहा है, लेकिन यह संतुलित नहीं है. जनवरी–मार्च 2026 की तिमाही में कुल व्यापार 1.84 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचा और 5.4% की ग्रोथ दर्ज हुई, लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इंपोर्ट (6.5%) एक्सपोर्ट (4.2%) से तेज बढ़ रहा है. इसका मतलब है कि भारत की बाहरी निर्भरता अभी भी ज्यादा है और घरेलू उत्पादन उतनी तेजी से ग्लोबल मार्केट में नहीं बढ़ पा रहा.
गुड्स ट्रेड दबाव में, सर्विस सेक्टर बना सहारा
रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि मर्चेंडाइज यानी सामान का एक्सपोर्ट 2.8% घटकर 112 अरब डॉलर रह गया, जबकि इंपोर्ट 11.9% बढ़कर 195.5 अरब डॉलर पहुंच गया. यह सीधा संकेत है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अभी दबाव में है, लेकिन सर्विस सेक्टर खासकर IT और डिजिटल सेवाएं ने स्थिति संभाली. सर्विस एक्सपोर्ट 9% बढ़कर 111 अरब डॉलर हुआ और 60.4 अरब डॉलर का सरप्लस आया. यही सरप्लस भारत के कुल व्यापार घाटे को काबू में रख रहा है.
ट्रेड डेफिसिट- नियंत्रण में लेकिन जोखिम जारी
कुल मिलाकर गुड्स और सर्विसेज को जोड़ें तो 23.15 अरब डॉलर का घाटा दर्ज हुआ जो साल का दूसरा सबसे कम है. रिपोर्ट के ग्राफ भी दिखाते हैं कि साल के दूसरे हिस्से में घाटा कुछ कम हुआ है, लेकिन यह सुधार स्थायी नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह काफी हद तक सर्विस सेक्टर पर निर्भर है.
एक्सपोर्ट-इंपोर्ट का पैटर्न क्या कहता है?
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के एक्सपोर्ट में इलेक्ट्रिकल मशीनरी, मिनरल फ्यूल्स और न्यूक्लियर रिएक्टर जैसे सेक्टर आगे हैं. आयरन-स्टील (18.4%) और व्हीकल्स (14.2%) में अच्छी बढ़त दिखी. वहीं, जेम्स और जूलरी में गिरावट आई जो ग्लोबल डिमांड कमजोर होने का संकेत है.
इंपोर्ट में सबसे बड़ा उछाल गोल्ड और सिल्वर से जुड़ी कैटेगरी में आया (82%) जबकि मिनरल फ्यूल्स (-11%) और आयरन-स्टील (-16.8%) में गिरावट रही. इसका मतलब है कि घरेलू खपत और निवेश का पैटर्न भी बदल रहा है.
ट्रेड पार्टनर्स- नए देशों से जुड़ा लेकिन निर्भरता खत्म नहीं
रिपोर्ट में यह पॉइंट अहम है कि भारत अब धीरे-धीरे अपने व्यापार को अलग-अलग देशों में फैला रहा है.
टॉप 10 देशों का एक्सपोर्ट शेयर घटकर 50% हो गया है. वहीं, इंपोर्ट में भी कंसंट्रेशन कम हुआ है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि चीन और रूस से इंपोर्ट अभी भी बढ़ रहा है. खासकर मैन्युफैक्चरिंग और फार्मा सेक्टर में चीन पर निर्भरता एक बड़ा रिस्क बना हुआ है.
सर्विस सेक्टर, लगातार मजबूत हो रही पकड़
- भारत 2025 में दुनिया का 8वां सबसे बड़ा सर्विस एक्सपोर्टर बन गया.
- 2015 से 2025 के बीच सर्विस एक्सपोर्ट लगभग 3 गुना बढ़ा
- ग्रोथ रेट 10.3% रही (ग्लोबल 6.6% से ज्यादा)
रिपोर्ट का एक अहम संकेत यह भी है कि अब भारत का सर्विस एक्सपोर्ट सिर्फ अमेरिका पर निर्भर नहीं है.
- नॉर्थ अमेरिका का शेयर घटा
- यूरोप का शेयर बढ़ा
- यह विविधता लंबे समय में स्थिरता देता है.
फार्मा सेक्टर- वॉल्यूम में ताकत! वैल्यू में कमजोरी
रिपोर्ट का बड़ा फोकस फार्मा पर है और यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास दिखता है. भारत दुनिया को सस्ती जेनेरिक दवाएं सप्लाई करता है.
- अफ्रीका की- 50%
- अमेरिका की- 40%
- UK की- 25% जरूरत
लेकिन हाई-वैल्यू सेगमेंट जैसे बायोलॉजिक्स, वैक्सीन, एडवांस थेरेपी में भारत की हिस्सेदारी बहुत कम है (करीब 0.6%). इसके अलावा…
- API के लिए 65% निर्भरता चीन पर
- R&D खर्च सिर्फ 7% (ग्लोबल 15–20%)
- यानी भारत वॉल्यूम में बड़ा है लेकिन टेक्नोलॉजी और वैल्यू में पीछे है.
ग्लोबल ट्रेंड- कीमतें और पॉलिसी दबाव
रिपोर्ट बताती है कि क्रूड ऑयल, कोल और प्रेशियस मेटल्स की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी है.
- गोल्ड-सिल्वर की कीमतें बढ़ीं
- ऊर्जा कीमतों में भी दबाव
- साथ ही यूएस-चीन ट्रेड मूवमेंट, WTO की अनिश्चितता और नए FTA जैसे कदम यह दिखाते हैं कि ग्लोबल ट्रेड माहौल तेजी से बदल रहा है.
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, आने वाले समय में अगर भारत को ट्रेड में मजबूत बनना है तो सिर्फ एक्सपोर्ट बढ़ाने से काम नहीं चलेगा. हाई-वैल्यू प्रोडक्ट, टेक्नोलॉजी और R&D पर बड़ा दांव लगाना पड़ेगा.








