केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री मामले पर सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने महावारी को लेकर अहम टिप्पणी की है. मंगलवार (7 अप्रैल, 2026) को सुनवाई के दौरान पितृसत्तामक व्यवस्था का सवाल उठा तो केंद्र ने इसकी परभाषा पर ही सवाल उठा दिया. केंद्र ने कहा कि भारत में महिलाओं को बहुत ऊंचा दर्जा दिया जाता है और पितृसत्ता की जो बात कही जाती है वह गलत है.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच इस मामले में सुनवाई कर रही है, जिसमें जस्टिस बी. वी. नागरत्ना भी शामिल हैं. केंद्र की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए. उन्होंने कहा कि सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिला के प्रवेश की वकालत करने वाले लोग पितृसत्ता का तर्क क्यों देते हैं.
एसजी तुषार मेहता ने कहा, ‘भारत में महिलाओं को न सिर्फ बराबरी का अधिकार दिया जाता है, बल्कि उन्हें ऊंचा दर्जा भी मिला है. हाल के समय में कई फैसलों में पितृसत्तातमक समाज की अवधारणा की बात कही गई है और एक तरह का जेंडर स्टीरियोटाइप उनमें दिखता है, लेकिन भारत का मामला अलग है. हमारे समाज में महिलाओं को पूजा जाता है. राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज सब देवियों के सामने नतमस्तक होते हैं इसलिए हमें ऐसी अवधारणाओं को पेश नहीं करना चाहिए.’
तुषार मेहता ने यह भी कहा कि पहले फैसलों में भी जब मंदिर में प्रवेश में भेदभाव न करने की बात कही गई है तो उनका मतलब जाति के आधार पर भेदभाव न करना था, कभी भी लैंगिक आधार पर इस विषय को लेकर बात नहीं हुई. उन्होंने कहा, ‘दुर्भाग्य से पहले एक दौर ऐसा था जब हिंदू समुदाय के एक हिस्से को पूजा का अधिकार नहीं था, लेकिन वो भेदभाव लैंगिक आधार पर नहीं था. पर पिछले कुछ 10 सालों से हर मामले को लैंगिक नजरिए से देखा जाने लगा है.
एसजी मेहता ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 14 लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता और अनुच्छेद 15 लैंगिक पहचान से इतर सभी के लिए समान अधिकारों की बात करता है. उन्होंने सबरीमाला मंदिर मामले में 2018 के फैसले की उस टिप्पणी पर भी आपत्ति जताई, जिसमें मंदिर में महिलाओं को एंट्री न मिलने की तुलना छूआछूत से की गई है.
उन्होंने कहा कि भारत पितृसत्तातमक या लिंग के आधार पर भेदभाव वाला समाज नहीं है, जैसा कि पश्चिमी देश समझते हैं. छूआछूत वाली टिप्पणी पर जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने कहा, ‘एक महिला के तौर पर मैं यह कह सकती हूं कि ऐसा नहीं होना चाहिए कि हर महीने के तीन दिन महिला को छूआछूत माना जाए और चौथे दिन जब महावारी खत्म हो जाए तो वह छूआछूत नहीं है. ये कड़वी सच्चाई है. अनुच्छेद 17 छुआछूत खत्म करने की बात करता है, तो ऐसा नहीं हो सकता कि महीने के तीन दिन लागू न हो और चौथे दिन लागू हो जाए. यहां कोई छुआछूत नहीं है.’
जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी पर एसजी तुषार मेहता ने कहा कि सबरीमाला मंदिर का मामला लैंगिक भेदभाव का नहीं है, यह मान्यता का विषय है. उन्होंने कहा, ‘सबरीमाला मंदिर के मामले में ऐसा नहीं है कि महीने में चार दिन कोई महिला मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकती. यहां मुद्दा ये है कि एक विशेष एज ग्रुप की महिलाओं की मंदिर में एंट्री पर प्रतिबंध है.’
एसजी मेहता ने कहा कि पूरी दुनिया में भगवान अयप्पा के मंदिर हैं और वह सभी के लिए खुले रहते हैं, सिर्फ सबरीमाला मंदिर में ही ऐसी व्यवस्था है. उन्होंने कहा कि कुछ रीति-रिवाज ऐसे हो सकते हैं और हमें उनका सम्मान करना चाहिए. जैसे गुरुद्वारा और अजमेर शरीफ दरगाह में सिर ढककर जाना होता है तो सब वहां सिर ढककर रखते हैं.









